सद्भाव, समरसता और संतवाणी का महाकुंभ : धनपुरी में कबीर प्रकट उत्सव ने जगाई इंसानियत, इबादत और इत्तेहाद की नई रोशनी


जहाँ गूंजे कबीर के निर्गुण, वहाँ मिटे भेदभाव के हर स्वर — भक्ति, सेवा, संस्कृति और सामाजिक सौहार्द का बना अनुपम संगम
✍️अतीक खान (बाबा)
धनपुरी (दैनिक जय संगवारी)।
“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।”

सदियों पहले संत शिरोमणि कबीरदास ने अपनी निर्भीक वाणी से मानव समाज को जो संदेश दिया था, उसकी अनुगूंज आज भी उतनी ही सजीव, उतनी ही प्रासंगिक और उतनी ही प्रकाशमान है। कबीर ने धर्म के नाम पर फैले आडंबर, जाति-पांति के भेदभाव, ऊँच-नीच की दीवारों और पाखंड पर प्रहार करते हुए इंसान को केवल इंसान समझने की सीख दी। उनके लिए सबसे बड़ा धर्म मानवता, सबसे बड़ी पूजा सेवा, सबसे बड़ी इबादत प्रेम और सबसे बड़ी साधना सत्य थी।
धनपुरी नगर के वार्ड क्रमांक 24 में आयोजित भव्य कबीर प्रकट उत्सव इसी मानवीय दर्शन का जीवंत प्रतिबिंब बनकर सामने आया। कबीर जन सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित यह आयोजन केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना, भाईचारे, सेवा, प्रेम और राष्ट्रीय एकता का ऐसा विराट महोत्सव बन गया जिसने नगरवासियों के हृदयों में आध्यात्मिक ऊर्जा और सामाजिक सद्भाव की नई लौ प्रज्ज्वलित कर दी।
संत कबीरदास का जीवन स्वयं एक संदेश है। माना जाता है कि उनका जन्म 15वीं शताब्दी में काशी में हुआ। वे महान संत स्वामी रामानंद के शिष्य बने और जीवनभर सत्य, समानता, प्रेम और ईश्वर की सच्ची भक्ति का संदेश देते रहे। उन्होंने कभी किसी धर्म या जाति का विरोध नहीं किया, बल्कि मनुष्य के भीतर बैठे अहंकार, अज्ञान और भेदभाव का विरोध किया। उनका प्रसिद्ध दोहा आज भी समाज को आईना दिखाता है—
“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।”

यही संदेश धनपुरी की पावन धरती पर आयोजित कबीर प्रकट उत्सव में जीवंत होता दिखाई दिया, जहाँ हर वर्ग, हर समाज और हर आयु के लोगों ने बिना किसी भेदभाव के एक साथ आस्था, सेवा और समरसता का उत्सव मनाया।
कार्यक्रम का शुभारंभ कबीर मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना एवं महाआरती से हुआ। संत कबीर की वाणी से गुंजायमान मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं ने भक्ति की ऐसी अलौकिक अनुभूति की, मानो वातावरण स्वयं आध्यात्मिक चेतना से आलोकित हो उठा हो। इसके उपरांत कबीर जन सेवा समिति के अध्यक्ष अरविंद रजक के नेतृत्व में सुसज्जित वाहन रैली निकाली गई। बाजे-गाजे, डीजे, निर्गुण भजनों और “संत कबीर अमर रहें” के जयघोषों के बीच निकली शोभायात्रा जब नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरी तो पूरा नगर श्रद्धा, उत्साह और उल्लास से झूम उठा। जगह-जगह नागरिकों ने पुष्पवर्षा कर शोभायात्रा का आत्मीय स्वागत किया।
रैली के समापन के बाद विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जहाँ हजारों श्रद्धालुओं ने एक पंक्ति में बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। यह दृश्य स्वयं संत कबीर के उस समतामूलक दर्शन का सजीव उदाहरण था जिसमें न कोई ऊँचा था, न कोई नीचा—सब केवल मानव थे।


🛑इस अवसर पर नगर पालिका धनपुरी की अध्यक्ष श्रीमती रविंद्र कौर छाबड़ा ने अपने उद्बोधन में कहा कि “संत कबीर किसी एक समाज या वर्ग के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के संत हैं। उन्होंने प्रेम, समानता, सत्य और सदाचार का जो संदेश दिया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। ऐसे आयोजन समाज को जोड़ने, नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत से परिचित कराने तथा सामाजिक समरसता को सशक्त बनाने का कार्य करते हैं। धनपुरी की यह पावन परंपरा निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनेगी।“🛑


भाजपा धनपुरी मंडल अध्यक्ष अजय शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि “संत कबीर ने अपने दोहों और वचनों के माध्यम से समाज को सत्य, करुणा, सद्भाव और मानवता का मार्ग दिखाया। आज जब समाज को एकता और सकारात्मक सोच की आवश्यकता है, तब कबीर का दर्शन और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। कबीर जन सेवा समिति द्वारा किया गया यह आयोजन सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को सुदृढ़ करने की दिशा में अत्यंत सराहनीय प्रयास है।”


कार्यक्रम के मुख्य आयोजक एवं कबीर जन सेवा समिति के ऊर्जावान अध्यक्ष अरविंद रजक ने सभी अतिथियों, श्रद्धालुओं एवं नगरवासियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि “कबीर प्रकट उत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मानवता, सेवा और सामाजिक चेतना का महापर्व है। हमारा उद्देश्य संत कबीर के विचारों को घर-घर तक पहुंचाना तथा समाज में प्रेम, भाईचारा, समरसता और सेवा की भावना को मजबूत करना है। समिति भविष्य में भी ऐसे जनकल्याणकारी एवं सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से समाज को जोड़ने का कार्य निरंतर करती रहेगी।”
समारोह में समिति के उपाध्यक्ष संतोष मेहरा, सचिव राम भगत महाराज, हरिदयाल साहू, संरक्षक कोदू दास, गोवर्धन दास, रतनलाल, रामनिवास कुशवाह, समाजसेवी गौरव तिवारी, हरिदास कुशवाह, अभिलाष बैरागी, अशोक मेहरा, श्यामलाल मेहरा, रमेश लोधी, सूरज कुशवाह, अंबिका मेहरा, लखनलाल महंत, जगमोहन दास, रामेश्वर दास, निलेश मेहरा, सूची कुशवाह सहित समिति के अनेक पदाधिकारी, समाजसेवी एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को और अधिक भव्य बना दिया।
पूरे आयोजन के दौरान अनुशासन, सेवा और समर्पण की ऐसी मिसाल देखने को मिली जिसने यह सिद्ध कर दिया कि जब समाज किसी महान संत के आदर्शों को आत्मसात करता है, तब केवल उत्सव नहीं मनते, बल्कि संस्कारों का नवसृजन होता है। संत कबीर की निर्गुण वाणी से गुंजायमान वातावरण में भक्ति का रस, सेवा का भाव और सामाजिक एकता का संदेश एक साथ प्रवाहित होता रहा।


कबीर दास जी ने कहा था—
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।”

और यही “ढाई आखर प्रेम” धनपुरी के इस आयोजन की आत्मा बनकर प्रत्येक श्रद्धालु के हृदय में उतरता दिखाई दिया। यहाँ धर्म का प्रदर्शन नहीं, बल्कि धर्म का वास्तविक स्वरूप—प्रेम, करुणा, सेवा और समरसता—दिखाई दिया।
समापन पर जब श्रद्धालु संत कबीर के भजनों के साथ लौट रहे थे, तब हर चेहरे पर आत्मिक संतोष, हर हृदय में मानवता का संदेश और हर मन में समाज को जोड़ने का संकल्प स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
वास्तव में, धनपुरी का यह कबीर प्रकट उत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, गंगा-जमुनी तहज़ीब, सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों का जीवंत उत्सव सिद्ध हुआ। यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता रहेगा कि समाज की वास्तविक शक्ति किसी बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि प्रेम, भाईचारे, इंसानियत और सेवा के उन अमर मूल्यों में निहित है, जिन्हें संत कबीरदास ने अपनी वाणी से अमर कर दिया।


“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।”

शायद यही संत कबीर की सबसे बड़ी सीख है—समाज बदलने से पहले स्वयं को बदलना। धनपुरी की इस ऐतिहासिक और अविस्मरणीय आध्यात्मिक बेला ने इसी संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का सफल और सार्थक प्रयास किया। यह आयोजन लंबे समय तक नगर की सांस्कृतिक स्मृतियों में श्रद्धा, सौहार्द और मानवता के स्वर्णिम अध्याय के रूप में याद किया जाएगा।

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