
साराडीह (पलारी)। मानवता, सामाजिक समरसता और सेवा भावना का एक अत्यंत प्रेरणादायक उदाहरण इन दिनों क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। निर्धन एवं अनाथ बेटी पूनम के विवाह की जिम्मेदारी समाज ने अपने कंधों पर उठाई है। इस पुनीत कार्य में छात्रावास समिति, बलौदाबाजार के अध्यक्ष धन्नू साहू ने स्वयं आगे बढ़कर पूनम का कन्यादान करने का संकल्प लिया है। उनके इस निर्णय की पूरे क्षेत्र में व्यापक सराहना हो रही है।
पूनम के परिवार की परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन हैं। ऐसे समय में जब एक बेटी के विवाह की चिंता सबसे बड़ी होती है, तब समाज ने यह संदेश दिया है कि कोई भी बेटी अकेली नहीं है। समाज उसके साथ खड़ा है। धन्नू साहू के नेतृत्व में इस अभियान ने अब एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले लिया है, जिसमें सेवा और सहयोग की भावना निरंतर बढ़ती जा रही है।
इस मानवीय पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सभी समाज के सभी वर्ग और सभी धर्मों के लोग अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग के लिए आगे आ रहे हैं। कोई आर्थिक सहयोग प्रदान कर रहा है, कोई विवाह की सामग्री उपलब्ध करा रहा है, कोई भोजन व्यवस्था में सहयोग दे रहा है, तो कोई अपने श्रम और समय का योगदान देकर इस बेटी के विवाह को सफल बनाने में जुटा हुआ है। यह दृश्य समाज में आपसी भाईचारे, एकता और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।
क्षेत्र के गांवों, कस्बों और शहरों में इस पहल की चर्चा बड़े जोरों पर है। लोग इसे केवल एक विवाह नहीं, बल्कि मानवता का महायज्ञ बता रहे हैं। हर कोई इस बात की प्रशंसा कर रहा है कि आज के समय में भी समाज के लोग किसी जरूरतमंद बेटी को अपनी बेटी मानकर उसके सुखद भविष्य के लिए एकजुट होकर खड़े हैं।
धन्नू साहू ने कहा कि “बेटी केवल एक परिवार की नहीं, पूरे समाज की होती है। यदि किसी बेटी के सिर से माता-पिता का साया उठ जाए या वह कठिन परिस्थितियों में हो, तो समाज का नैतिक दायित्व है कि वह उसके जीवन की नई शुरुआत में परिवार बनकर साथ खड़ा हो। कन्यादान करना मेरे लिए सम्मान और सौभाग्य की बात है।”
इस पुनीत कार्य ने समाज में सेवा, सहयोग और सामाजिक उत्तरदायित्व की नई प्रेरणा जगाई है। अनेक समाजसेवी, जनप्रतिनिधि, युवा, महिलाएँ और गणमान्य नागरिक भी इस अभियान से जुड़ते जा रहे हैं। लोगों का मानना है कि ऐसे कार्य समाज में विश्वास, अपनापन और भाईचारे को मजबूत करते हैं तथा आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देते हैं कि इंसानियत और सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।
यह पहल केवल एक बेटी के विवाह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज को यह संदेश दे रही है कि जब पूरा समाज एक परिवार बनकर खड़ा होता है, तब कोई भी बेटी स्वयं को अनाथ महसूस नहीं करती। यही हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा और भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति है।