
“सहमति के सरोकारों का उत्सव: माननीय जिला न्यायाधीश हिदायतउल्ला खान का आगामी नेशनल लोक अदालत 09 मई 2026 के आयोजन पर प्रेरक उद्बोधन”
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शहडोल जिले अंतर्गत आने वाली धनपुरी की पावन धरती उस क्षण विशेष गौरव से आलोकित हो उठी, जब देपालपुर (इंदौर) से पधारे माननीय जिला न्यायाधीश श्री हिदायतउल्ला खान साहब ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से जनमानस को अनुग्रहीत किया। सहज विनम्रता, उच्च न्यायिक दृष्टि और समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता से ओतप्रोत उनका व्यक्तित्व मानो न्याय और मानवीय मूल्यों का सजीव प्रतिरूप बनकर उपस्थित हुआ। निजी प्रवास के दौरान भी जनसरोकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता तब और मुखर हो उठी, जब मजदूर दिवस के अवसर पर एसईसीएल रीजनल वर्कशॉप में उन्होंने लोक अदालत की महत्ता पर अपने ओजस्वी और प्रेरणास्पद विचार व्यक्त किए—ऐसे विचार, जो न्याय को केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि आपसी सहमति, सौहार्द और सामाजिक समरसता का उत्सव सिद्ध करते हैं।

धनपुरी(शहडोल )न्याय केवल विधि के अक्षरों में सीमित नहीं, बल्कि वह समाज के अंतःकरण में बसने वाली संवेदनशीलता, समरसता और पारस्परिक विश्वास का उज्ज्वल प्रतिबिंब होता है। इसी विचारधारा को मूर्त रूप देते हुए देपालपुर (इंदौर) से पधारे माननीय जिला न्यायाधीश श्री हिदायतउल्ला खान साहब ने मजदूर दिवस के पावन अवसर पर एसईसीएल रीजनल वर्कशॉप धनपुरी में आयोजित कार्यक्रम में लोक अदालत की महत्ता पर अत्यंत प्रेरणास्पद और हृदयस्पर्शी विचार व्यक्त किए।
अपने सहज, विनम्र और गरिमामय व्यक्तित्व के अनुरूप उन्होंने बताया कि वे निजी पारिवारिक कार्य से धनपुरी आए थे, किंतु जब उन्हें यह स्नेहपूर्ण आमंत्रण प्राप्त हुआ कि मजदूर दिवस जैसे श्रम-सम्मान के पर्व पर उन्हें वर्कशॉप में अपने विचार व्यक्त करने हैं, तो उन्होंने इसे हर्षपूर्वक स्वीकार किया। उनके इस भाव से उनकी समाज के प्रति प्रतिबद्धता और जनसरोकारों के प्रति सजगता सहज ही परिलक्षित होती है।
माननीय न्यायाधीश श्री खान साहब ने अपने उद्बोधन में लोक अदालत को न्याय का ऐसा लोकानुरागी माध्यम बताया, जहाँ कानून की कठोरता के स्थान पर सहमति की कोमलता और संवाद की मधुरता का वास होता है। उन्होंने कहा, “लोक अदालत की वास्तविक सुंदरता इसी में निहित है कि यहाँ न्यायाधीश केवल साक्षी होता है, जबकि वास्तविक न्याय स्वयं पक्षकारों द्वारा आपसी समझ और सहमति से किया जाता है।” यह विचार न केवल न्याय व्यवस्था की आत्मा को उद्घाटित करता है, बल्कि समाज में सौहार्द और विश्वास के महत्व को भी रेखांकित करता है।

उन्होंने विस्तार से बताया कि लोक अदालत, न्यायपालिका की ऐसी सशक्त व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य न्याय को सरल, सुलभ और शीघ्र बनाना है। यहाँ विवादों का समाधान किसी दंडात्मक प्रक्रिया के माध्यम से नहीं, बल्कि आपसी संवाद, सहिष्णुता और समझदारी से होता है। यही कारण है कि लोक अदालत से निकलते समय दोनों पक्षों के चेहरों पर संतोष, आत्मीयता और विजयी मुस्कान का भाव स्पष्ट रूप से झलकता है।
लोक अदालत की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि यह मंच न केवल समय और धन की बचत करता है, बल्कि पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक संबंधों को भी सुदृढ़ करता है। यहाँ कोई न्यायालय शुल्क नहीं लिया जाता और निर्णय अंतिम होता है, जिससे विवाद का स्थायी समाधान संभव हो पाता है। इसके साथ ही पक्षकारों को पूरा न्याय शुल्क भी वापस कर दिया जाता है।
अपने उद्बोधन के माध्यम से माननीय श्री हिदायतउल्ला खान साहब ने यह भी स्पष्ट किया कि लोक अदालत की स्थापना का मूल उद्देश्य न्यायिक तंत्र पर बढ़ते बोझ को कम करना और आमजन को सुलभ न्याय प्रदान करना था। किंतु समय के साथ यह केवल एक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों का सशक्त संवाहक बन चुका है। उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से लोक अदालत और समाज सेवा की विशेष महत्ता उल्लेखित करते हुए कहा कि –
जागते रहिए जमाने को जगाते रहिए,
मेरी आवाज़ में आवाज़ मिलाते रहिए,
दीन दुखियों की मदद से बड़ी सेवा न कोई,
अब कोई रो न सके गीत वो गाते रहिए,
क्या पता कौन से किरदार में फिर हो मिलना,
टूट जाने पे भी रिश्तों को निभाते रहिए,
आप सबसे गुजारिश है इस “हिदायत “की,
भूले भटकों को सही राह दिखाते रहिए,
और पक्षकारों को लोक अदालत में सदा लाते रहिए।
धनपुरी नगर में उनकी उपस्थिति और उनके ओजस्वी विचारों ने कार्यक्रम को एक विशिष्ट गरिमा प्रदान की। उनके व्यक्तित्व की गंभीरता, वाणी की मधुरता और विचारों की उच्चता ने उपस्थित जनसमूह को गहराई से प्रभावित किया। निस्संदेह, उनका यह संदेश समाज के लिए एक प्रेरणास्रोत है, जो न्याय को केवल अधिकार नहीं, बल्कि आपसी समझ और सहमति का उत्सव बनाता है।