अविनाश कैपिटल फेस-2 चुनाव विवादों में: नामांकन प्रक्रिया में धांधली के आरोप, निर्वाचन आयुक्त से चुनाव निरस्त करने की मांग

समय सीमा, ओवरराइटिंग और पक्षपात के आरोपों से घिरा सहकारी समिति चुनाव, सदस्यों ने सौंपे दो अलग-अलग शिकायत पत्र

रायपुर। सड्डू स्थित अविनाश कैपिटल फेस-2 प्लॉट आवासीय सहकारी समिति मर्यादित (पंजीयन क्रमांक-887) के चुनाव को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान नामांकन में कथित अनियमितताओं और रिटर्निंग अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठाते हुए समिति के सदस्यों ने राज्य सहकारी निर्वाचन आयुक्त, छत्तीसगढ़ को विस्तृत शिकायत पत्र सौंपा है। शिकायत में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह व्यक्त करते हुए नाम निर्देशन प्रक्रिया को निरस्त कर पुनः चुनाव कराने तथा मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार 2 जून 2026 को आयोजित नामांकन प्रक्रिया के दौरान कई ऐसी घटनाएं सामने आईं, जिनसे चुनाव की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि नामांकन प्रक्रिया को जल्दबाजी में पूरा कराया गया और नियमों की अनदेखी करते हुए कुछ प्रत्याशियों को विशेष लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया।

महज एक घंटे में 22 उम्मीदवारों का नामांकन, सदस्यों ने उठाए सवाल

निर्वाचन आयुक्त को सौंपे गए पहले शिकायत पत्र में आरोप लगाया गया है कि रिटर्निंग अधिकारी ने मौखिक रूप से घोषणा की कि नामांकन प्रक्रिया के लिए केवल एक घंटे का समय दिया जाएगा और इसी अवधि में सभी उम्मीदवारों को अपना नामांकन दाखिल करना होगा। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि मात्र 60 मिनट में 22 उम्मीदवारों के नामांकन पत्र स्वीकार किए गए, जो सामान्य परिस्थितियों में संभव नहीं माना जा सकता।

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इतनी कम अवधि में नामांकन प्रक्रिया पूरी कराना लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना के विपरीत है तथा इससे कई सदस्यों को उचित अवसर नहीं मिल पाया। उनका कहना है कि चुनाव जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में सभी इच्छुक सदस्यों को पर्याप्त समय और समान अवसर मिलना चाहिए था।
नामांकन सूची में कटिंग और ओवरराइटिंग से बढ़ा विवाद
शिकायत में एक और गंभीर आरोप नामांकन सूची तैयार करने को लेकर लगाया गया है।शिकायतकर्ताओं के अनुसार जब नामांकन सूची में क्रमांक 1 से 11 तक उम्मीदवारों के नाम दर्ज किए गए, तब सूची पूरी तरह साफ-सुथरी थी और कहीं भी कटिंग या ओवरराइटिंग नहीं दिखाई दी। लेकिन जैसे ही दूसरे पैनल के उम्मीदवारों के नाम और उनकी श्रेणी दर्ज की जाने लगी, उसी स्थान पर कटिंग, सुधार और ओवरराइटिंग दिखाई देने लगी शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि यह स्थिति पूरी प्रक्रिया को संदेह के घेरे में खड़ा करती है और रिटर्निंग अधिकारी की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

उनका कहना है कि निर्वाचन प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की काट-छांट या संशोधन गंभीर विषय है, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

समय समाप्त होने के बाद भी नामांकन स्वीकार करने का आरोप दूसरे शिकायत पत्र में आरोप लगाया गया है कि नामांकन जमा करने की निर्धारित समयावधि सुबह 11:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक तय थी। इसके बावजूद समय समाप्त होने के बाद भी कुछ

प्रत्याशियों के नामांकन पत्र स्वीकार किए गए।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि समय सीमा निर्धारित थी तो उसका पालन सभी उम्मीदवारों पर समान रूप से लागू होना चाहिए था। समय समाप्त होने के बाद नामांकन स्वीकार करना चुनावी नियमों के विपरीत है और इससे यह संदेश जाता है कि कुछ उम्मीदवारों को विशेष छूट दी गई।

एक पक्ष को लाभ पहुंचाने की कोशिश का आरोप

दोनों शिकायतों में यह भी आरोप लगाया गया है कि पूरी प्रक्रिया के दौरान कुछ निर्णय ऐसे लिए गए, जिनसे एक विशेष पैनल अथवा समूह को लाभ पहुंचाने का प्रयास प्रतीत होता है। शिकायतकर्ताओं ने इसे निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिए गंभीर खतरा बताते हुए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

उनका कहना है कि यदि समय रहते मामले की जांच नहीं हुई तो चुनाव परिणाम विवादों में घिर सकते हैं और सदस्यों का लोकतांत्रिक प्रक्रिया से विश्वास उठ सकता है।
निर्वाचन आयुक्त से की गई प्रमुख मांगें

शिकायतकर्ताओं ने राज्य सहकारी निर्वाचन आयुक्त से निम्न मांगें की हैं—

2 जून को संपन्न नाम निर्देशन प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए।पूरी चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए।संबंधित रिटर्निंग अधिकारी की भूमिका की जांच की जाए।दोषी पाए जाने पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। पारदर्शिता सुनिश्चित करते हुए पुनः नामांकन और चुनाव कराया जाए।

निर्वाचन आयुक्त के फैसले पर टिकी निगाहें

सहकारी समिति के चुनाव में लगे इन आरोपों के बाद अब पूरे मामले पर सदस्यों और उम्मीदवारों की नजर राज्य सहकारी निर्वाचन आयुक्त के निर्णय पर टिकी हुई है। यदि शिकायतों में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो चुनाव प्रक्रिया पर बड़ा असर पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर, जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और चुनावी प्रक्रिया में वास्तव में किसी प्रकार की अनियमितता हुई या नहीं

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